भर वंश के राजा बड़े प्रतापी शुरवीर ऐश्वर्य शाली, और योद्धा हुए हैं।

 

आज से लगभग कुछ वर्ष पूर्व उत्तरी भारत वर्ष में भर भारशिव विशाल शासन करते थे। भर वंश के राजा बड़े प्रतापी शुरवीर ऐश्वर्य शाली, और योद्धा हुए हैं। जिन्होंने अपने बाहुबल और पराक्रम से, देश पर आक्रमण करने वाली शक, कुषाण, यवन आदि विदेशी जातियों को मार भगाने में सक्षम हुए हैं। यह लोग वर्तमान मथुरा इलाहाबाद अवध मिर्जापुर काशी वगैरह में रियासतें स्थापित कर सदियों राज्य करते रहे हैं क्योंकि यह लोग पहले शैव संप्रदाय के अनुयाई थे। शिव जीके परम उपासक होने के कारण ये लोग प्रारंभ में भारशिव नाम से विख्यात हुए तत्पश्चात यही राजभर और भर जाति के नाम से प्रसिद्ध हुए। भर क्षत्रिय सम्राट भर राजा  राम करन का इतिहास पर एक  नजर डालते हैं। 13 वीं सदी ग्राम गढ़ा, परगना एकदाला, तहसील खागा, जिला फतेहपुर गढ़ा ग्राम इस जनपद का सबसे बड़ा गाव है। यमुना नदी के वाए तट पर खागा तहसील से 19 किलोमीटर, दक्षिण ग्राम राजधानी से 3 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। कहा जाता है कि इस ग्राम का नाम गढ़ा यहां के भर राजा राम करन का यहां गढ़ (किला) होने के कारण गढ़ा पड़ा। बहुत पहले भर राजा का यह किला मौके पर मौजूद था। परन्तु पठानों द्वारा यह किला ध्वस्त कर दिया गया।

 वर्तमान में इस ऐतिहासिक गाव मे ऐतिहासिक महत्व का कुछ भी अवशेष नहीं है। गढ़ा गाव 1906 ईसवी में इतना बड़ा था कि इस ग्राम में 35 पुरवा थे।(सन्दर्भ ग्रन्थ जिला गजेटियर फतेहपुर (1906) पेज 211पर लेखक एच आर नेविल लिखा है कि ग्राम गढ़ा के पश्चिम यमुना नदी, पूरब कछार, उत्तर तिहार और दक्षिण चंदापुर ग्राम स्थित है। स्थानीय किंवदंतियों में प्रचलित है कि 13 वीं सदी में जब अलाउद्दीन ख़िलजी ने कोट किले के भर राजा कैलाश के राज्य पर आक्रमण किया तो उस समय गढ़ा के राजा राम करन जो भर राजा कैलाश के परम मित्र थे, भर राजा कैलाश के तरफ़ से युद्ध में भाग लिए थे। उस युद्ध में भर राजा कैलाश वीरगति को प्राप्त हो गए थे। उस युद्ध में भरो के अपार जनधन की हानि हुई, वहां की सत्ता पठानों को सौंप कर सेना वापस दिल्ली चली गई थी।





 इन पठानों के गुप्तचर के रूप में काम करने वाले अन्य मुस्लिम राजा करन के किलेके इर्द, गिर्द पुरवो में बसने लगे। राज्य की गोपनीय जानकारी पठान बन्धुओं के माध्यम से सुल्तान अलाउद्दीन को मिलने लगी। अलाउद्दीन खिलजी के लुट पाट और हिन्दू राजाओं को जबरजस्ती इस्लाम कबूल करवाने से भर महाराजा राजा राम करन बहुत गुस्से में रहते थे। अब अपने राज्य में मुस्लिमो के बसने से चिंतित हो गए। उन्हे येन केन अपने राज्य से बाहर निकालने का दबाव बनाने लगे। कोट के पठान बन्धुओं के माध्यम से सुल्तान अलाउद्दीन को यह सूचना दी गई। सुलतान ने कहा समय का इंतजार करिए उचित समय पर कार्यवाही करेंगे। एक दिन भोर(प्रातः ) में जब तमाम भर सैनिक सो रहे थे, कुछ जो सवेरे जग जाते थे, नित्य क्रिया से निपट रहे थे। कुछ व्यायाम शाला में दंड कसरत मार रहे थे कि उसी समय सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के सैनिकों ने और पठानों ने भर राजा राम करन के किला गढ़ा पर आक्रमण कर दिया। 



राजभर राजा और उनके सैनिक इस आकस्मिक आक्रमण से अचंभित हो गए। अचानक धोखे से हमला होने लगा,भर सैनिक जो जहां थे, वहीं से महल और शस्त्रागार की तरफ दौड़े। परंतु आकस्मिक आक्रमण ने राजभर राजाओं को संभलने का मौका नहीं मिला। जो जहां थे वहीं से युद्ध भूमि की तरफ दौड़े दुश्मनों से लड़ते लड़ते वीरगति को प्राप्त हुए। भर राजा रामकरन भी युद्ध भूमि लड़ते लड़ते वीरगति को प्राप्त हुए।

 राजपरिवार के अन्य बूढे, बच्चे, महिलाएं आदि नाव से यमुना नदी को पार करके जिला हम्मीरपुर की तरफ पलायन कर गए। पठानों ने किले पर कब्जा ही नहीं किया। बल्कि किले को तहस नहस कर जमीदोज करके उसका निशान मिटा दिया। क्योंकि प्राय भरों के वंशजअपनी सत्ता वापस पाने के लिए संगठित होकर पुनः आक्रमण कर दिया करते थे। फिर उसे कबजा भी कर लेते थे, भरो के राज्य चले जाने के बाद भी हार नहीं मानते थे, फिर दोबारा आक्रमण करते और जीत जाते थे, क्योंकि भर वीर पराक्रमी थे भरो से सामने से लड़ने की किसी की हिम्मत नहीं होती थी जबकि भरो को धोखे से ना हराया जाए,लेखक राम चन्द्र राव ( गोरखपुर)


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