महाराजा त्रिलोकचंद्र राजभर ने (दिल्ली ) इंद्रप्रस्थ पर 9 पीढ़ियों तक राज किया
भर महाराजा तिलोक चंद्र का शासनकाल 918 भर महाराजा त्रिलोकचन्द्र यह एक महत्वकांक्षी शासक थे।
इनका शासन उत्तर प्रदेश के बहराइच में था। जिस समय यह बहराइच पर शासन किया करते थे। उस समय तक यह नगरी का बड़ा हिन्दू धार्मिक महत्व हुआ करता था । महाराजा तिलोक चन्द्र राजभर (त्रिलोक चन्द्र) ने बहराइच को अपनी राजधानी बनाये।
भारत के इतिहास में महाराजा त्रिलोकचंद भर भारशिव क्षत्रिय का गौरवपूर्ण स्थान रहा है। यहां के भर रणबांकुरों ने देश, जाति, धर्म तथा स्वाधीनता की रक्षा के लिए भरो ने अपने प्राणों का बलिदान देने में कभी संकोच नहीं किया। उनके इस त्याग पर संपूर्ण भारत को गर्व होना चाहिए। वीरों की इस भूमि में भरत भर भारशिव के छोटे-बड़े अनेक राज्य रहे ।जिन्होंने भारत की स्वाधीनता के लिए संघर्ष किया।
इन्हीं राज्यों में अपना एक विशिष्ट स्थान है जिसमें इतिहास के गौरव महाराजा त्रिलोकचंद्र राजभर ,राजा चंदल राजभर, महाराजा भर वीरसेन भारशिव, महाराजा बिजली भर, बारादेव राजभर, असीलदेव भर, महाराजा सुदास भारशिव, केरार वीर, हरदेव भर, जग्गू जगदेव राजभर केरार वीर , महाराजा काकोरन, महाराजा बंनार भर महाराजा लाखनदेव भर, राजा धिसू भर इत्यादि वीर शिरोमणि महाराजा सुहेलदेव राजभर ने जन्म लिया है।
महाराजा त्रिलोकचंद्र राजभर उसके बाद एक विशाल सेना लेकर इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) के शासक विक्रमपाल को पराजित किया। इस युद्ध में काफी जनधन की हानि हुई । तिलोक चंद्र भर के सैनिकों ने 1 लाख सैनिको को मौत के घाट उतार दिया। और इंद्रप्रस्थ दिल्ली राज्य पर अपना शासन स्थापित कर दिया । महाराजा त्रिलोकचंद्र के नाम से अन्य राजाओ को दहशत होती रहती थी। इन्द्रपस्थ (दिल्ली) को जीतने के बाद महाराजा तिलोक चन्द्र राजभर ने अपने राज्य का विस्तार किये। तमाम अन्य राज्यों एवं नगरों को अपने अधीन कर लिये । उन्होने दिल्ली तक के सम्पूर्ण क्षेत्र और पहाड़ी क्षेत्र तक के अधिकतर भू-भाग एवं अवध के हिस्से को अपने शासन के अन्तर्गत अधीन कर लिया। महाराजा तिलोकचंद राजभर ने बालार्क में अपने समर्पित बालार्क मन्दिर का निर्माण करवाये थे। जिसे तुर्की आक्रमणकारियों ने तोड़ दिया। इन्होने ने ही बालार्क की उपाधि भी धारण की थी। महाराजा तिलोक चन्द्र राजभर की 9 पीढ़ियों ने इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) पर अपना एकक्षत्र शासन स्थापित किया। इनकी 9 पीढियों का वर्णन इस प्रकार है-
• महाराजा तिलोक चन्द्र भर
• महाराजा विक्रम चन्द्र भर
• महाराजा अमीण चन्द्र भर
• महाराजा रामचन्द्र भर
• महाराजा कल्याण चन्द्र भर
• महाराजा भीम चन्द्र भर
• महाराजा लोक चन्द्र भर
• महाराजा गोविन्द चन्द्र भर ( इनका शासन 1092 ई0 तक रहा)
• महारानी भीमादेवी ( लगभग कुछ 6 वर्षों तक शासन किया)
महाराजा गोविन्द चन्द्र भर अपनी विवाह के कुछ समय पश्चात युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हो गये। जिस कारण से इनकी कोई संतान नही थी। अपने पति की मृत्यु के पश्चात महारानी भीमादेवी ने कुछ वर्षो तक शासन किया। परन्तु पति की मृत्यु के कारण इनका मन राजकाज के कार्यों में नही लगा , शोक से इनका स्वास्थय बिगड़ता जा रहा था। इस कारण से इन्होने अपना विशाल साम्राज्य अपने अध्यात्मिक हरगोविन्द दास को दान में देकर मृत्यु का वरण किया। और अपनी मृत्यु से पहले यह कहा कि इस विशाल साम्राज्य को किसी योग्य शासक को सौपने की बात कही थी। वह योग्य शासक थे अनंगपाल तोमर जिनके पूर्वज अरावली की पहाडियो पर स्थित थे, चूंकि महाराजा तिलोक चन्द्र भर और महाराजा अनंगपाल तोमर के पूर्वजों में घनिष्ठ मित्रता थी । इसलिये इन्हे ही अर्कवंश के इस विशाल साम्राज्य का पालन पोषण करने का अधिकार प्राप्त हुआ। तथा इस साम्राज्य के पालन पोषण के लिये इन्हे “अर्कपाल” या “सूरजपाल’ के नाम से सम्बोधित किया जाने लगा।दोस्तों तिलोकचंद भर को अपने नाम के पीछे अर्क लगाने का मकसद यह था कि वह सूर्य के उपासक थे। उन्होंने बहराइच में सूर्य बालार्क मंदिर भी बनवाए थे । इस कारण वह नाम के पीछे अर्क लगाने लगे। अर्क का मतलब होता है सूर्य। सूर्य का पर्यायवाची शब्द अर्क होता है,
महाराजा तिलोक चन्द्र भर द्वारा निर्मित बालार्क मन्दिर में प्रत्येक वर्ष जून माह में एक विशाल मेले का आयोजन किया जाता था यह मेला सूर्यदेव की आराधना करने के लिये समर्पित किया जाता था। भर क्षत्रिय राजाओ ने अपनी वीरता का परिचय भारत के हर हिस्से में दिया है,