भारत में एक जगह है जहां होली नहीं मनाई जाती महाराजा डलदेव की याद में
उत्तर प्रदेश की वह जगह जहां एक भर राजा की मौत के गम में लोग नहीं खेलते होली...
विक्रांत सिंह और डॉक्टर गोपाल नारायण श्रीवास्तव क्या लिखते हैं भरो के बारे में तो आइए जानते हैं,
रायबरेली
जहा पूरा देश होली के जश्न में डूबा हुआ है वहीं यूपी का एक इलाका ऐसा भी है जहां लोग होली के दिन राजा डलदेव बलदेव राजभर की मौत के शोक में डूबे रहते हैं।
ये इलाका यूपी की रायबरेली जिले का डलमऊ क्षेत्र के इस इलाके में आने वाले 28 गांवों के लोग होली के दिन न रंग खेलते हैं और न किसी तरह का जश्न मनाते हैं। लोगों के घरों में किसी तरह का कोई पकवान भी नहीं बनाया जाता। यह इतिहास राजभर जाति का है मुझे नहीं लगता कि राजभर जाति अपने इतिहास को जानते होगे
600 साल पहले की है ये कहानी
दरअसल, करीब 600 साल पहले डलमऊ में राजा डलदेव राजभर रहा करते थे। बताया जाता है कि राजा डलदेव राजभर काफी प्रभावशाली राजा वीर लड़ाकू योद्धा थे। इलाके में उनका रुतबा था। इसी बीच उनके दुश्मनों ने जौनपुर के शासक इब्राहिम शाह शर्की से मिलकर होली के दिन भरो के दुर्ग पर हमला करा दिया।
इब्राहिम साह शर्की ने भरो को मारने के लिए हर तरह के लालच दिया ,
दुश्मनों ने हमले के लिए होली का दिन इसलिए चुना था क्योंकि होली के दिन राजा डलदेव भर की सेना होली के मौके पर छुट्टी पर रहती थी, और तलवार की पूजा करते थे हाथों में अस्त्र शस्त्र नहीं उठाते थे, और जो सेना महल में होते थे वह नशे में डूब जश्न मनाया करते थे,
दुश्मनों की सेना जब डलमऊ पहुंची तो उस वक्त महराजा डलदेव राजभर की सेना नशे में मस्त थी।
शाह शर्की ने अपनी सेना के साथ राजा डलदेव के महल को चारों तरफ से रात में घेर लिया। उसके बाद हमला बोला।राजा डलदेव राजभर की सेना नशे में थी। जिसके चलते मुकाबला नहीं कर पाई और हमले में राजा का कत्ल कर दिया गया। राजा डलदेव राजभर का सर कट जाने के बाद भी दुश्मनों का गला धड़ से अलग करते हुए आगे बढ़ रहे थे, शर्की कि सेना डर गई थी यह क्या हो रहा है जो जहां था वहीं छुप गया,
तभी से डलमऊ कस्बे समेत 28 गांवों में रहने वाले सभी अपने भर राजा के गम में होली के दिन से अगले 3 दिनों तक शोक में रहते हैं
इतिहास के अनुसार ग्यारहवी सदी में उत्तर भारत का लगभग पूरा क्षेत्र श्रावस्ती सम्राट सुहेलदेव राजभर के राज्य में था परन्तु बारहवी सदी आते आते मुसलमानों के आतंक से भरो की राज्य व्यवस्था काफी प्रभावित हुई । यहाँ तक कि हरदोई के भर राजा हरदेव को सवर्णों की मदद से मुसलमानों ने पराजित किया ।तथा जबरन भरो को मुसलमान बनाने का अभियान छेड़ दिया I उन्हें जबरन धर्म परिवर्तनके लिए बाध्य किया गया I इसका बिरोध करने पर भरो और अन्य हिन्दू जातियों का खुलेयाम कत्ले आम किया गया ।और भरो को राजनैतिक, आर्थिक तथा धार्मिक यातनाओ का सामना करना पड़ा I मुसलमानों का यह धार्मिक दमन तेरहवी सदी तक चलता रहा I इस वीर जाति को आत्म-रक्षा के लिये भर जाति का पलायन होने लगा था I उनकी राजसत्ता कमजोर होने लगी I क्योंकि चाटुकार ने उन्हें सारा संदेश और भरो की कमजोरियां बता दी, की भरो से सामने से नहीं जीता जा सकता है । उन्हें धोखे से प्रास्त करना होगा।
चौदहवीं सदी के अंतिम वर्षों में भार-शिव एक बार फिर संगठित हुए ।और उन्होंने अपनी शक्ति बढ़ायी I पंद्रहवी सदी आते-आते भर राजा डलदेव भर ने मुसलमानों के शर्की राजवंश विशेषकर जौनपुर के शासक इब्राहीमशाह शर्की (1402 ,1440) के धार्मिक अत्याचारों के विरुद्ध रायबरेली के जनपद में अपनी राजसत्ता हासिल कर ली। राजा डलदेव भर उस समय सभी राजाओ के नेता बन चुके थे I इन्होने डलमऊ को अपनी राजधानी बनाया ।और वही किला बनाकर रहने लगे I इनके छोटे भाई बालदेव रायबरेली के राजा बने तब रायबरेली का नाम भार-शिव राजाओ के आधार भरौली था। जो बाद में काल के प्रभाव से धीरे-धीरे रायबरेली हुआ I समय बीतने के साथ साथ भरो ने महाराजा डलदेव भर के नेतृत्व में एक होकर मुसलमानों से लोहा लेने हेतु मंसूबे बाँधने लगे
संयोग से एक दिन राजा डलदेव भर जंगल में शिकार खेलने गये थे I उस जंगल से होकर इब्राहीम शाह शर्की के एक मुलाजिम सैयद बाबा हाजी की पुत्री सलमा पालकी में बैठ कर कही जा रही थी I कही-कही यह भी उल्लेख मिलता है कि गंगा विहार के दौरान वह नाव में भटकती हुयी डलमऊ के किले तक आ गई थी I कथा जो भी हो पर उसका सामना डालदेव से अवश्य हुआ I संयोग से वह सुन्दर और जवान थी I उसे देखकर डलदेव भर को वे सारे अत्याचार याद आ गए जो मुसलमानों ने हिन्दू औरतो के साथ किये थे । यह भी विश्वास किया जाता है कि डलदेव भर उसके सौन्दर्य पर मुग्ध हो गए थे i सच्चाई जो भी हो, पर इसमें संदेह नहीं कि डलदेव भर के हुक्म पर सलमा डलमऊ के किले में लाई गयी I डलदेव राजभर सलमा से विवाह भी करना चाहते थे i उसने इस आशय का सन्देश भी भेजा पर मुसलमानों के लिय यह उनके आंकी बात थी I सैयद बाबा हाजी अपनी फ़रियाद लेकर इब्राहीम शाह शर्की के पास गए । और यह मामला मुसलमान वर्सेस हिन्दू हो गया I रायबरेली गजेटियर में (अमर सिंह बघेल, आई ए एस ) में इस घटना का उल्लेख निम्न प्रकार हुआ है –
उक्त सम्बन्ध में जनश्रुति से पता चलता है के इब्राहीम शाह शर्की डल देव राजभर के जन-बल, सैन्य–बल और उसकी व्यक्तिगत वीरता से परिचित था I डलदेव भर पर आक्रमण करने का साहस उसे नहीं हुआ i वह भलीभांति परिचित था कि हम भरो से युद्ध जीत नहीं पाएंगे,
उसे बताया गया कि रायबरेली भरो के नेतृत्व में एक सबल राज्य बन गया है I वहां 25 किलो मीटर का निर्माण हो चुका है I सभी हिन्दू जातियां उसके सेना की अंग बन चुकी है और उन्हें राजा के किलो में रखकर प्रशिक्षित किया जाता है I राजा हरदेव के साम्राज्य पतन के बाद सारे भर सरदार रायबरेली में जुटे हुए है उन्होंने एक विशाल सेना का निर्माण कर लिया है I ऐसी ताकत से लड़ना जोखिम भरा काम होगा I
यहाँ जौनपुर में जबसे केरार भर का किला और अटाला देवी का मंदिर तोडा गया है तभी से भार-शिव मुसलमानों के खून के प्यासे बन गये है I इस दशा में रायबरेली पर धावा बोलना सही नहीं होगा I तब सुलतान ने अपने मंत्रियों को राजदरबार में सोच बिचार के लिए बुलाया I अब तक शर्की साम्राज्य में पंडितो का समावेश हो चुका था I पंडितो ने बताया की भर एक बहादुर वीर जाति है, पर अभी होली का त्यौहार निकट है I इसे भार-शिव बड़े उत्साह से मनाते है और भंग तथा महुये शराब पीकर बेसुध एवं भोग विलास में मस्त रहते है I उनकी सेना और प्रजा की भी यही हालत होती है और सबसे बड़ी बात कि इस दिन वे तलवार नहीं उठाते I अतः मौका पाकर चुपके से इस अवसर पर आक्रमण किया जाए तो विजय में संदेह नहीं होगा I इब्राहीम शाह शर्की को यह तजबीज बहुत पसंद आयी। और उसने वही किया I रायबरेली गजेटियर के अनुसार जब शर्की सुलतान अपनी सेना लेकर आगे बढ़ा तो उसकी पहली मुठभेड़ डलमऊ से 23 किलोमीटर पहले सुदामापुर में डलदेव राजभर के एक अन्य भाई काकोरण राजभर से हुई, जो काकोरी कस्बा को राजा काकोरन ने बसाये थे।
इतिहास साक्षी है कि मुसलमानों और चाटुकारो ने भरो के साथ बड़ा क्रूर बर्ताव किया। जिसकी स्मृति कथाये उस क्षेत्र में आज तक व्याप्त है,
डलमऊ क्षेत्र के गांव आज भी उस विनाशकारी की होली के स्मृति में होली नहीं मनाते। और महिलाये विधवा का प्रतीक बनकर उस दिन अपनी नथुनी और चूड़ियाँ उतार देती है I भार –शिव राजा डलदेव भर एवं बलदेव भर के एक भव्य स्मारक डलमऊ से 4 किमी दक्षिण-पूर्व पखरौली में बना हुआ है। जिसमे राजा डालदेव भर की अशीश मूर्ति विद्यमान है जिसपर प्रति वर्ष भरौटिया अहीर सावन के महीने में दूध चढ़ाते है,
यह भर वीरो का इतिहास है भरो को अपना इतिहास जानना चाहिए और होली भरो के लिए काला दिन है होली नहीं मनाना चाहिए