महराजगंज का भर राजा अंगिया वीर का इतिहास

 यह कहानी 14 वी. शताब्दी की बात है जब रायबरेली पर भर क्षत्रिय राजाओं का शासन था,

 होली के दिन सभी भर भारशिव क्षत्रिय वीरों पर एक साथ हमला किया गया ताकि एक दूसरे को कोई सहयोग ना कर सके। भरो के सैन्य बल बाहुबल से भली भांति परिचित था इब्राहिम शाह शर्की। इब्राहिम शाह शर्की वह जानता था कि धोखे से भरो को मारना तो आसान है अगर भर क्षत्रिय बच जाएंगे तो फिर संगठित होकर हमारे साम्राज्य का नामोनिशान मिटाकर रख देंगे , इसने होली के दिन चाटुकारो के मदद से भरो का भरताज खत्म कर दिया, आगिया वीर के साम्राज्य पर भी होली का दिन अचानक आक्रमण हुआ था ।


 ऐसे ही वीर शूरवीर अगिया वीर भी थे,भर राजा अगिया वीर किले का एक इतिहास भदोही नगर गंगा तट से 21 किलो मीटर उत्तर में स्थित है।इसकी दक्षिण सीमा गंगा जी द्वारा परिभाषित है।। लगभग 600 वर्ष पूर्व चौदहवीं शताब्दी में भदोही परगना में भरों का राज्य था, जिसके डीह, कोट,खंडहर ,किले तलाव ,आज भी मौजूद हैं। भदोही नगर के अहमदगंज, कजियाता, पचभैया, जमुन्द मुहल्लों के मध्य में स्थित बाड़ा कोट मोहल्ले में ही भरों की राजधानी थी। भर जाति का राज्य इस क्षेत्र सहित पूरे उत्तर प्रदेश में था। गंगा तट पर बसे भदोही राज्य क्षेत्र में सबसे बड़ा राज्य क्षेत्र था। सुरियावां, गोपीगंज, जंगीगंज, खमरिया, औराई, महराजगंज,, कपसेठी,, चौरी, जंघई, बरौत, कोइरौना, कटरा, धनतुलसी, बनारस, चंदौली आदि क्षेत्र भदोही राज्य में था। गंगा तट का यह भाग जंगलों की तरह था।

 भदोही नाम भरद्रोही का अपभ्रंश है जिसका तात्पर्य है कि ऐसा क्षेत्र जिसका भरों से द्रोह है। भदोही के अतिरिक्त भरों के होने के प्रमाण विभिन्न गावों के नाम से भी प्रमाणित होता है जैसे - भरदुआर, (भरद्वार), बरौत (भरौत), रायपुर, सागर रायपुर,भटान, बडागांव (भरगाँव), सगरा, बिछिया, जगापुर, भगवानपुर, डुहिया, सुरियावां, अंधेडीह, भदोही जिले में जिससे भी बात करिये सभी लोंग भदोही को मात्र भरों से जोड़ते हैं। भर या भारशिव केवल भदोही में ही नहीं हैं पर एक काल में उत्तर भारत के बड़े हिस्से में भरों का प्रभाव दिखता है। तब भर या भरद्रोह को भदोही मात्र से जोड़ना और भदोही की पहचान बना देना क्या चीज है।। अगिया वीर का किला कितना पुराना किला है लगभग चौदहवीं शताब्दी के आस पास की है।। यह इतिहास कभी समेटा तो नहीं गया लेकिन भदोही जिले का गजेटियर जो कि सरकारी दस्तावेज है उसमें थोड़ा जिक्र जरूर है।

 इस कहानी को आदरणीय श्री ठाकुर प्रवीण सिंह  बताते हैं कि उस समय भदोही जिले के महराजगंज के भर जाति के राजा अगिया वीर महाराजा का सम्राज्य था जिन्हें भर राजा का शासन था।। भर राजा अगिया वीर महाराज बड़े वीर प्रतापी राजा थें।। चौदहवीं शताब्दी में भारत धरा के सबसे वीर प्रतापी राजा थें।। भर राजा अगिया वीर महाराज सात भाई थें सातों भाई अलग अलग जगहों पर शासन करते थें।। कहा जाता है कि अगिया वीर महाराज वीर योद्धा थे, लेकिन भोग बिलास में मस्त रहते थे भारशिव नागवंश के अंन्तिम भर संम्राट वीरों के वीर अगिया वीर महाराज के संम्राज्य का भी पतन होली के दिन हुआ था।। अगिया वीर महाराज महराजगंज के पुस्तैनी, खांनदानी, पीढ़ी दर पीढ़ी राजघराने के संम्राट थें।। अगिया वीर महाराज इनते वीर पराक्रमी थें कि इनको सामनें से हराना लोहे के चने चबाने जैसा था।

 इनको सामने से हराना नामुमकिन था। अपनी भतीजी छोटे भाई जोगिया वीर की पुत्री भर राजकुमारी अरई की दिदिया, सौ लखा देवी, ठकुराईन देवी, सती माई के अज्ञानता में हुई गलती के कारण होली के दिन एक बहुत बड़े षड्यंत्र के तहत अगिया वीर किले, डलमऊ के भर राजा डलदेव के किले से लेकर भारत देश के सभी भारशिव क्षत्रिय भर राजाओं के संम्राज्य पर एक साथ धोखे से रात में जौनपुर के शासक इब्राहिम शाह सर्की के नेतृत्व में मुसलमानों द्वारा बहुत बड़ा हमला कर लगभग पूर्ण रूप से भर संम्राज्य का  सूर्यास्त कर दिया गया क्योंकि होली के दिन भर महाराजा और उनकी पुरी सैनिक भांग, मदिरा का सेवन कर होली के त्योहार को बड़े धूम धाम से मनाते थें।। अस्त्र शस्त्र का पूजा पाठ कर होली के दिन अस्त्र शस्त्र नहीं उठाते थें, दुश्मन को दोस्त समझकर गले लगाते थें, इन्हीं कमजोरियों का लाभ उठाकर मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा महाराजा डलदेव के साथ साथ सभी भर राजाओं के संम्राज्य का पतन कर दिया गया। और क्षत्राणीयो भर राजकुमारी सती हो गई। भर जाति के महाराजा यहाँ मुसलमानों के पैर नहीं जम्ने देते थें।

 भरो के भय से दिल्ली तक की फौजें परेशान रहती थी।। अद्वितीय साहस, अदम्य उत्साह और देश भक्ति की भावना से भर राजाओं नें कई शताब्दीयों तक मुसलमानों के आक्रमण का लोहा लेते रहें।। और मुसलमानों के पैर भारत धरा पर जम्ने नहीं दियें।। मर गयें मीट गयें भारत माँ की रक्षा करते हुए अपनें देश धर्म, संस्कृति सभ्यता की रक्षा करते हुए राजा से रंक हो गयें लेकिन कभी भी मुसलमानों के सामनें नहीं झुकें।। धन्य हैं ऐसे वीरों के वीर शूरवीर भर महापुरुषों को जिन्होनें मातृ भूमि की रक्षा के लिए अपनें संस्कृति सभ्यता की रक्षा के लिए अपनें प्राणों की आहुति दे दी और ठीक उसी तरह माँ धरती माँ अपनें शूरवीर पुत्रों की यादों को अपनें सीने से लगाकर, अपनें आँचल में छुपाकर आज भी भर महापुरुषों की यादों को संयोग कर रखी हैं।। भारत के हर कोनें में 20 से 25 किलो मीटर की दूरी पर भर राजाओं के किले कोट, खाई, दरी आज भी खंडहर के रूप में विद्यमान हैं।। भर जाति का बलिदान अमर है।। भर महापुरुषों का बलिदान देश के लिए था।। देश की रक्षा में अंनगिनत बलिदान चढ़ानें वाली जातियों में भर महापुरुष प्रथम थें।। हे राजभरों के वंशजों अपनें आपको जानों।। अपनें आपको पहचानों।।

 अपनें पूर्वजों का सम्मान करों।। आपके पूर्वज महान थें।। आप उन्हीं महान महापुरुषों की संन्तानें हैं।। राजभर समाज के लिए सबसे बड़ा दुर्भाग्य की बात ये है कि जिस महान महापुरुष का अंतिम दाह संस्कार हुआ वो जगह आज उस महान महापुरुष के नाम से अगिया वीर मुक्ति धाम से प्रसिद्ध है लेकिन उस महान महापुरुष की चरनी 600 वर्षो से आज भी उसी रूप में विद्यमान है।। मैं पूरे राजभर समाज से विनम्र निवेदन करते हैं कि आप अगर मंदिर का निर्माण नहीं कर सकते हैं तो कम से कम अपनें महापुरुष की श्रद्धांजलि में  चबूतरा ही बनवा दीजिये।। अगिया वीर महाराज की महिमा अपरम्पार है।। जो भी ब्यक्ति इनके शरण में आते हैं, सच्चे मन से इन्हें पूजते हैं उनकी मन्नतें अवश्य ही पुरी होती है!

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