महाराजा नहुष भर की कहानी
तहसील मुख्यालय घोसी प्राचीनकाल में भारशिव राजा नहुष भर की राजधानी के रूप में विख्यात थी। इस सम्बन्ध में अनेक ऐतिहासिक साक्ष्य आज भी मौजूद हैै। राजा नहुष के किले की खुदाई कर लो खेत बना रहे हैं नगर में आज कल जहाँ सिंचाई विभाग का निरीक्षण गृह है, उसे भारशिव राजा नहुष भर के कोट के रूप में मान्यता है। राजा नहुष उनकी दान वीरता एवं शूरवीरता विख्यात थी, जिसके कारण उन्हें देवेन्द्र का पद प्राप्त हुआ था।
देवीभागवत के छठे स्कन्ध के चैथे एवं पाँचवे अध्याय में यह उल्लेख मिलता है कि प्रतापी दैत्यराज वृत्रासुर का वध देवेन्द्र इन्द्र द्वारा किया गया था। इसके कारण उन्हें ब्रह्म हत्या लगी थीं उस समय पुण्य प्रताप के कारण भारशिव राजा नहुष को इन्द्र पद प्राप्त हुआ।और काफी समय तक इंद्रासन पर राज किया राजा नहुष ने। देवराज इंद्र को सबक सिखाने के लिए राजा नहुष गद्दी पर जा बैठे,
इन्द्र बने राजा नहुष का मन इन्द्राणी शचि पर मोहित हो गये। इंद्रदेव राजा नहूष के डर से इंद्रासन छोड़ कहीं और चले गये थे, माया से प्रेरित शची ने राजा नहुष से कहा कि देवराज इन्द्र मेरे पास ऐरावत हाथी एवं अनके प्रकार के विमानों पर सवार होकर आया करते थे आप जब महान ऋषियों के कन्धे पर ढोई जाने वाली पालकी पर आयेंगे तो मैं आपको स्वयंमेव प्राप्त हो जाऊँगी। भर राजा नहुष ऋषियों द्वारा ढोई जाने वाली पालकी में बैठकर शची के पास जा रहे थे,
शीघ्र पहुँचने की दृष्टि से वे लगातार ऋषियों को उत्प्रेरित करते रहे। ऋषि इस अपमान को बर्दास्त न कर सके और उन्होंने नहुष को सर्प योनि में उत्पन्न होने का श्राप दे दिया। शापग्रस्त नहुष भर को देवेन्द्र पद छोड़ना पड़ा और अनेक वर्षों तक सर्प योनि में रहना पड़ा।
कहा जाता है कि शापग्रस्त राजा नहुष सर्प के रूप में अपने किले में स्थित एक कुएँ में रहे, उस समय सरयू नदी उस किले के पास से बहती थी जो आज छोटी सरयू के रूप में जानी जाती है। श्राप ग्रस्त नहुष भर नदी तट तक पानी पीने के लिए आते थे। द्वापर में धर्मराज युधिष्ठिर ने श्राप ग्रस्त नहुष का उद्धार किया। राजा नहुष का किला आज भी कोेट के रूप में विद्यमान है। इतिहासकारों के अनुसार यदि इस क्षेत्र की खुदाई करायी जाये तो कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आयेगे।
वाराणसी-गोरखपुर राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे स्थित इस ऐतिहासिक नगर में सड़क के किनारे ही एक पोखरा है और वहाँ एक अतिप्राचीन शिव मन्दिर है। पोखरे के विषय में जनश्रुति है कि इसका निर्माण राजा नहुष भर ने ही कराया था। यह नृपति पुष्कर के रूप में जाना जाता था, जो कालान्तर में नर पोखरे और वर्तमान में नया सरोवर के रूप में जाना जाता है।
यहाँ एक गयासुर नाम का तालाब है। इसका महत्व गया पुण्यक्षेत्र में फाल्गु नदी तटपर स्थित विष्णुपद के बराबर माना जाता है। यहाँ पर श्रद्धालु पितृपक्ष में पिण्ड दान करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि नहुष भारशिव के शासन काल में गयासुर नामक राक्षस का बध इसी स्थल पर किया गया था।





