राजा सुहेलदेव और सैयद सालार गाजी की कहानी

 दुनिया के इतिहास में शायद भर क्षत्रिय ही सिर्फ इकलौता कौम है, जिसके वीरता और पराक्रम की गाथाएं किताबों में लिखी हुई अधिक मिलती है।

 भर वीरो अपनी वीरता तलवार पराक्रम के बल उस समय सबसे बड़ी शक्ति थे। जिनका सामना करने की हिम्मत मुगलो के सामने से कभी युद्ध करने की हिम्मत नहीं होती थी। वह तो अपनों ने पीठ में खंजर मारा नहीं तो किसकी मजाल जो भरो को हरा दे, एक भर 100 मुगलों पर भारी थे,

भरो ने जिस पर विश्वास किया। वही लोगो ने विश्वाघात किया। एक ऐसा राजा जो भारत की सरजमीं पर ऐसा दहशत फैलाया कि नाम सुनते मुगलों की नानी याद आ जाती थी,भर राजाओं की सेना भले ही कम होती थी। लेकिन दुश्मनों से लड़ने के लिए पीछे नहीं हटते थे। यह वीर कौम की सराहना हम नहीं तमाम इतिहासकारों ने उल्लेख किया है,

 राजभर वीर पराक्रमी शूरवीर योद्धा की कहानी की तरफ रुख करते हैं। जिस भर महाराजा का इतिहास बहुत कम जिक्र होता है। बहराइच की कुछ अनसुनी बातें जो आपको हिला कर रख देगी।

बहराइच का पुराना नाम भर,राइच था। बाद में धीरे धीरे इसका नाम बहराइच हो गया । बहराइच पहले भरो की राजधानी थी। इसी बहराइच में राष्ट्रीय वीर योद्धा का जन्म हुआ था,

जिसका नाम महाराजा सुहेलदेव राजभर था 

जो अपने धर्म संस्कृति सभ्यता के प्रति जान निछावर करने वाले राजा थे

 महाराजा सुहेलदेव राजभर जी का कल्पना अन्य राजाओं से नहीं की जा सकती क्योंकि महाराणा प्रताप शिवाजी जैसे महान योद्धाओं ने इनके मार्गदर्शन पर चले ,और अपने गौरव धर्म के प्रति सम्मान प्राप्त किया ,राजा सुहेलदेव के घोड़े का नाम तेज बहादुर था। जो तेज बहादुर राजा की सारी बात समझ लेता था महाराजा सुहेलदेव वीरों के वीर थे। सुहेलदेव राजभर की माता जय लक्ष्मी हर रोज वीरों की कहानियां सुनाया करती थी। इससे उनका मनोबल बढ़ता गया ,और इस तरह बीरो के वीर राजा की उपाधि प्राप्त हुई, महाराजा सुहेलदेव राजभर 16 साल की उम्र में राज गद्दी पर बैठे, और अपने राज्य का कार्यभार संभालेे, राजा सुहेलदेव राजभर बचपन से ही तलवार से खेलने का बड़े शौकीन थे।


 महाराजा सुहेलदेव राजभर का शिक्षा आश्रमों से हुई थी राजा सुहेलदेव शिव के परम भक्त थे ।और इनको इनके जो छोटे छोटे राजा थे। वे लोग भी शिव लिंग अपने महलों में स्थापित करवाया जो आज बहुत सारे महलों में सनातन की पहचान देखने को मिलते हैं। भारशिवो ने भारत भूमि के हर स्थानों पर शिवलिंग स्थापित किया। दूसरी शताब्दी से इसका उल्लेख मिलता है। जो खंडहरों में तब्दील हो गया है महाराजा वीरसेन भारशिव राजभर इसके उत्तरदायित्व रहे हैं, वीरसेन भारशिव राजभर शिव के बहुत बड़े भक्त थे इतने महान राजा का इतिहास लोगों ने क्यों भुला दिया था,

अब सैयद सालार गाजी के बारे में भी जान लेते हैं

सैयद सालार गाजी सिंधु नदी को पार करते हुए भारत पर आक्रमण किया । और जबरन हिंदुओं को मुसलमान बनाने के मकसद से भारत आया था, उसने भारत के तमाम हिस्सों को रौदता हुआ। बहराइच पहुंचा।उसने अयोध्या के राम मंदिर को भी छती पहुंचाया, इसके दहशत से जो छोटे-मोटे राजा थे सब इसके साथ सम्मिलित होते चले गए। उसने मुल्तान पर विजय प्राप्त की और अपने अभियान के 18वें महीने में वह दिल्ली के निकट पहुंचा । गजनी की सहायता से उसने दिल्ली पर विजय प्राप्त करली। और 6 महीने तक वहीं रहा। फिर उसने कुछ प्रतिरोधों के बाद मेरठ पर विजय प्राप्त की। इसके बाद, वह कन्नौज के लिए रवाना हुआ , 

मसूद ने सतरिख में अपना मुख्यालय स्थापित किया , और बहराइच , गोपामऊ और बनारस पर कब्जा करने के लिए अलग-अलग बलों को भेजा । बहराइच के राजा सहित स्थानीय शासकों ने उसकी सेना के खिलाफ एक गठबंधन बनाया। 

महाराजा सुहेलदेव राजभर के साथ बहराइच के चित्तौड़ा नानपारा में घमासान युद्ध हुआ। उसमें सैयद सालार गाजी की हार हुई, और यह लड़ाई इतनी भयानक थी कि पूरे भारतवर्ष में दहशत फैल गई। और कहा जाता है कि जिस देश से आया था। उस देश के घर का एक एक चिराग बुझ गया था। कोई भी विदेशी आक्रांता भारत पर आंख उठाकर देखने की हिम्मत नहीं हुई ढाई सौ बरसों तक। भर वीरों की वीर गाथा भारत में विख्यात है लेकिन वामपंथी इतिहासकारों ने इन्हें अपने किताब में लिखने के बजाय इन्हें ऐसे अंधेरे में रखा कि राजा सुहेलदेव को बहुत कम लोग जानते हैं

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