तमाम इतिहासकारों ने भरो को महान क्षत्रिय बताया है

 मिस्टर थामसन ने हिन्दू ट्राईब्स एण्ड कास्ट पृष्ठ 363 में लिखे है, कि अवध तथा आजमगढ़ के भर क्षत्रिय प्राचीन समय में बड़े पराक्रमी वीर चतुर कलाकार थे. जो इनके कार्यो से प्रकट होता है। 


क्योकि इनके बनाये हुये प्राचीन कोट, किले, खाई, हवेलिया, तालाब महल और पड़ाव विचित्र कारीगरियों से पूर्ण नमूना है। चाहे जो कुछ हो परन्तु यह मानना पड़ता है कि मुसलमानों के आक्रमण के पूर्व भर क्षत्रिय जाति का अधिपत्य इस देश के अधिक भू भाग पर था । यह लोग  15वी शताब्दी के अन्त तक सम्पूर्ण अवध और बिहार आदि प्रान्तों पर अपना अधिकार जमाये हुये थे‌। और बहुत दिनों तक बड़ी योग्यता के साथ यहाॅ राज्य करते रहे ,


धीरे धीरे समय के परिवर्तन से, इनकी अवनति होने लगी और पश्चिमी दुश्मनों का प्रभाव पूरब की ओर बढ़ने लगा । इस प्रकार भरो में पारस्परिक वैमनस्यता फैल गयी। और उत्तरी हिन्दुस्तान पर मुसलमानों का आक्रमण होना प्रारम्भ हुआ, जिसके फलस्वरूप हिन्दू राजा शक्त्हिीन होकर पराजित हुये । 

भरत भर क्षत्रिय लोग अपने अस्तित्व की रक्षा के लिये लगभग दो सौ वर्ष तक युद्ध करते रहे, मरते दम तक लड़ते रहे, परन्तु असंगठित और न्यूनतम संख्या में होने के कारण तथा स्वधर्मियों के विरोध पक्ष ग्रहण कर लेने से अधिक समय तक न टिक सके ।


 तथापि इनके कम गौरव का विषय नही है कि यह लोग देश की मर्यादा और स्वतंत्रता के लिये अपने सम्पूर्ण वैभव को नष्ट कर दिये । 


 मिस्टर उडवन बन्दोबस्त अधिकारी, अवध प्रान्त ने अंकित किया है कि फैजाबाद के मंगलसी परगने के अंतर्गत तथा सन्निकट भर जाति के प्राचीन किले के खण्डहर अधिक संख्या में पाये जाते है।  परन्तु सुदृृढ़ और कारीगरियों से पूर्ण है जो इनके विजेता शत्रुओं द्वारा नष्ट कर दिये गये हैं। भरत भर क्षत्रिय के किले, कोट,खाईयों को देखने से भारत के प्राचीन सभ्यता की स्मृतियाॅ नवीनता को धारण कर लेती है। साथ ही साथ भर भारशिव क्षत्रिय जाति की उन्नतिशील दशा भी ध्यान आ जाता है जो स्वधर्मियों के विरोध पक्ष ग्रहण करने से इस दशा को प्राप्त हुये । 

भर वीर जाति के शूर वीर, पराकर्मी, रणकुशल और कला निपुण होने के प्रमाण इनसे बढ़कर स्पष्ट और क्या हो सकता है। कुछ विद्वानों की राय है कि भर भरत लोगों की सभ्यता दूसरों से सीखी हुयी अनुकरणीय सभ्यता है, परन्तु बहुत छान-बीन और निर्णय के पश्चात् यह मालुम हुआ कि उनकी यह सभ्यता उन्हीं द्वारा उपार्जित सभ्यता है। 


 हिन्दू ट्राईब्स एण्ड कास्ट वालूम वन पृष्ठ 362 में मिस्टर सर ए, कनिंघम लिखते है कि देश में स्थित प्राचीन किले, कोट, तालाब और इमारते जो बहुताय संख्या में पायी जाती है,वह भर राजाओं की है। किसी समय देश के बड़े भूभाग पर भरो का बोलबाला था, जिसके प्रभुत्व और सभ्यता की प्राचीन परम्परा आज तक चली आ रही है। नि संदेह ये लोग उस समय अधिक संख्या में उत्तरी भारत में आबाद स्वतंत्र थे । 


अर्ली हिस्ट्री आफ इण्डिया चतुर्थ E D में डाक्टर स्मिथ ने लिखा है कि कुछ राजपूत प्राचीन निवासियों की संतान है। अर्थात मध्य प्रान्त तथा दक्षिण के गोंड और भर भारशिव उन्नति करके अपने को राजपूत कहलाने लगे । इनके अनुसार बुन्देल खण्ड के चंदेल, राजपूताने के राठौर भर जाति व दक्षिण के राष्ट्रकूट गोंड की संतान है। 

 महापंडित राहूल सांकृतायन ने अपनी पुस्तक सप्तमी के बच्चे शीर्षक डीह बाबा में लिखते है. कि डीह बाबा भरों के पूर्वज थे। कहते हैं कि कौन सी भर जाति । ईशा से लगभग दो हजार वर्ष पूर्व जब आर्य भारत में आये तब ये हजारो वर्ष पूर्व जो जाति सभ्यता के उच्च शिखर पर पहुॅच चुकी थी, जिसने सुख और स्वच्छता युक्त हजारों भव्य महलों वाले सुदृढत्र नगर बसाये थे, 

जिनके जहाॅ समुद्र में दूर तक यात्रा करते थे,और बहुत बड़े पैमाने पर इनका कारोबार विदेशों तक चलता था। व्यसन निमग्न पाकर आर्यो ने उनके सैकड़ों नगरों को ध्वस्त किया तभी उनके ही छाप आज भारत देश के नाम में है। वही भरत जाति या भर जाति विश्व की सबसे पुरानी सिन्धुघाटी की सभ्यता वाले भरतों(भरो) का आर्यो का युद्ध सिन्धुघाटी में हुआ था । 

     इसमें राहुल सांकृतायन साहब ने भरो की तारीफ के साथ साथ आर्यो से युद्ध बता दिये हैं । जबकि राजा ययाति के पाॅच लड़कों यदु तुर्वस दुहय अनु एवं पुरू को पंचजन आर्य कहा गया है। छटा बंश ऋषभ देव के पुत्रों को आर्य कहा गया है। बाहर से 2000 वर्ष पूर्व मलिच्छ आये थे जिन्हें इतिहासों में शक कुशाण हूण कहा गया है जो 8 वी शदी में सूर्य एवं अग्नि से शुद्ध होकर हिन्दू बने और भारतीय व्यवस्था को झटका देते रहे। अन्त में महान भारत कई खण्डो में बटा और मुस्लिमों का प्रभाव बढ़ गया ।

भरत भर क्षत्रिय की गाथा आपको हर जगह मिल जाएंगे

धन्य है वह समाज जो इस देश के चिराग जलाने के लिए अपने घर का चिराग बुझा दिया


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