राजभर क्षत्रिय राजा गोपाल खुटहन जौनपुर का इतिहास
राजभर क्षत्रिय राजा गोपाल खुटहन जौनपुर का इतिहास
कहा जाता है कि राजा गोपाल भर ने अपने किले को बचाने के लिए नदी का रुख मोड़ दिये थे,भर राजा गोपाल के किले के साइड से नदी बहती थी।राजभर राजा को हमेशा डर बना रहता था कि कहीं हमारा किला नदी के चपेट में ना आ जाए, इसलिए राजा ने यह काम किया,
खोदाई में आज भी मिलते हैं आदिकालीन मिट्टी के बर्तन व लाखोरी ईंटें पाई जाती है
बदलापुर (जौनपुर): गोमती के प्रांजल में अवस्थित गढ़ा गोपालापुर ऐतिहासिकता को समेटे हुए है। हजारों वर्ष एक 'भर' राजा गोपाल ने यहां की कोट को बचाने के लिए गोमती की धारा को दूसरी तरफ बहने के लिए घुमा दी थी, जो आज भी उसी तरह बह रही है। तहसील के राजस्व अभिलेखों में दर्ज उक्त कोट 32 एकड़ 66 डिसमिल में फैली है।
कोट के बारे में किंवदंतीया है कि हजारों वर्ष पूर्व एक भर राजा गोपाल गढ़ा गोपालापुर के विशाल टीले पर राज्य करते थे। उस समय गंगा गोमती नदी क्षेत्र के कृष्णापुर गांव से सीधे उस कोट से सटकर बहती हुई पच्छू बहनी बलुआ में जाकर मिलती थी। इससे कोट कटान की जद में आ गयी थी। कोट के अस्तित्व के लिए उन्होंने कृष्णापुर गांव में बांध बनवाकर गोमती नदी की धारा को तिलवारी, सुतौली, गुलरा से बहने के लिए घुमा दिया था जो आज भी इन्हीं गांवों से होकर गंगा प्रवाहित होती है
• राजस्व अभिलेखों में दर्ज 32 एकड़ 66 डिसमिल का कोट समेटे है
लेख में अवकाश प्राप्त सबइंस्पेक्टर सत्यनारायण सेकस तिवारी, प्यारेलाल तिवारी, सभापति तिवारी, शेषमणि आदि बताते हैं कि उस नपुर) टीले पर 4,5 फुट खोदाई करने पर दीवार, बड़े-बड़े कुए, मिट्टी के बर्तन व ईंट मिलते हैं। इतना ही नहीं 5,6 वर्ष पूर्व ही सोने व चांदी के सिक्के भी पाये गये थे। इससे यह भी पता चलता है कि कोट पर नजर डालें तो चारों तरफ वर्ष 1971 में आयी भयंकर बाढ़ से जहां खलार ही खलार दिखाई पड़ता है।
विशाल कृष्णापुर, तिलवारी, अहियापुर, शाहपुर टीले पर नीचे से देखने पर जंगल ही सानी, सियराबासी, महमदपुर गुलरा होकर बह रही है। नदी और क्षेत्र का टीले को 'भर क्षत्रिय' राजा ने पाटकर ऊंचा भौगोलिक दृश्य भी ऐसा किया था।
वर्ष 1871 व 19वीं शताब्दी के जंगल दिखाई पड़ता है लेकिन ऊपर सुतौली, बलुवा, बड़ेरी आदि गांव जल चढ़ने पर एक सुंदर-सा गांव दिखाई देते थे। गांव के वहीं यह कोट ही सिर्फ बचता के गांव सियरावासी के औदान तिवारी व जिस पर अगल-बगल के लोग कोट के ऊपर आकर बसे थे। भरो के बाहुबल और पराक्रम से पूरा भारत परिचित हैं




