भारशिव भरो का इतिहास जौनपुर

 शाही_किला_जौनपुर का इतिहास

  लेखक डॉ_दिनेश_सिंह जौनपुर के भर भारशिव के बारे में क्या कहते हैं तो आइए जानते हैं

सिंचा है जिसने भारत देश को अपने खून समशिरों से

 इतिहास भरा पड़ा हैं उन महान भर वीरों से

गंगा गोमती के पावन तट पर बसा जौनपुर भारत के इतिहास में अपना विशेष स्थान रखता है । प्राचीन काल में इसका आध्यात्मिक व्यक्तित्व और मध्यकाल में सर्वागिक उन्नतिशील स्वरूप इतिहास के पन्नो पर दिखाई पड़ता है । भरो के राज्य काल में यह समृध्दशाली राजवंश के हाथो सजाया गया।

 इस राजवंश ने जौनपुर में अपनी राजसत्ता बनाकर इसकी सीमा दूर दूर तक फैलाया । यहां दर्जनो मंदिरों के निर्माण के साथ ही खुब सूरत शाही पुल और केरार किले का निमार्ण और पूरी राजधानी सुगंध से महकती रहती थी । राजनीतिक , प्रशासनिक , सांस्कृतिक , कलात्मक और शैक्षिक दृष्टियो से जौनपुर राज्य की शान बेमिसाल था,

शाही किला को केरार किला और जौनपुर किला के नाम से भी जाना जाता है। इसका इतिहास बेहद उतार-चढ़ाव वाला रहा है। सबसे पहले इस किले को एक टीले पर बनाया गया था और इसे केरार किला कहा जाता था। 1376 से 1377 के बीच फिरोज शाह तुगलक के सेनापति इब्राहिम नेब बरबक ने इसे फिर से बनवाया।

यह किला गोमती नदी पर बने शाही पुल के पास ही है। इसके निर्माण में इस्तेमाल की गई ज्यादातर सामग्री कन्नौजी के राजा के समय के ऐतिहासिक स्थलों की है।


गोमती के तट पर खड़ा यह जौनपुर का ताज है.. 

शान जिसकी भी निराली खंडहर वह आज है... 

दर्द में दूबी हुई है दास्ता जिसकी बहुत... 

आज भी दरिया के किनारे खड़ा फौलाद है...


 नगर के बीचो-बीच गोमती नदी के पूर्वी तट पर स्थित उत्थान-पतन का मूक गवाह शाही किला आज भी पर्यटकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केन्द्र बना हुआ है। वही पुरातत्व विभाग ने जीर्णोद्धार के नाम कई वर्ष कच्छप गति से काम चलाया।


 जो आज तक पूरा ही नहीं हुआ। ऐतिहासिकता को समेटे इस किले में मौजूद सुरंग का रहस्य अभी भी बरकरार है जिसके बारे में स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता है।


जहां आज शाही किले की इमारत खड़ी है वहां पहले समतल मैदान व बालू के रेत इ हुआ करते थे। जिस पर जंगली जानवर गोमती नदी में पानी पीने के बाद विश्राम किया करते थे।

 यह स्थान राजभरों को  बड़ा रोचक लगा और उन्होंने मजबूत मिट्टी का प्रयोग करके इसे टीले का रूप दे दिया।

 इसी समय से इस दुर्ग के कलेवर व में वृद्धि होने लगी, यह समय हर्षवर्धन  काल से पहले का था। हर्षवर्धन के पुत्र  उत्ताधिकारी आदित्य सेन ने इसे ईंट रेत पत्थरों से संवृत्त किया तथा पूरब की ओर और कुछ और विस्तार किया। बारहवीं शताब्दी के मध्य विजयचंद यहां के राजा हुए और उन्होंने इस टीले को छावनी का रूप दे दिया।

 उन्होंने किले की ढलान पर केरार का बहुत बड़ा मंदिर बनवाया और वहां मूर्ति स्थापित किया जिसका धड़ आज भी शेष है।

वह दिन भी आया जब दिल्ली का तख्त फिरोजशाह तुगलक के हाथों में था। बंगाल और बिहार उसको साम्राज्य सीमा में थे तथा दिल्ली से इन दूरस्थ स्थानों को शासन चलाने की सुविधा के लिए मध्य में स्थित जौनपुर को उसने एक केन्द्र के रूप में चुना। यह किला भी उसकी दृष्टि से अछूता न रहा और सन 1362 ई. में फिरोजशाह तुगलक ने इस दुर्ग को नवीन रूप प्रदान किया। जलापूर्ति के लिए इसके मध्य में एक बड़ा गहरा कुआ आज भी वर्तमान में भी है। किले के मुख्य द्वार का निर्माण सन 1567 ई. में सम्राट अकबर ने कराया था। इसमें एक ऐसा स्नानागार है जो तुर्की स्नानागार की नकल है और इसका निर्माण नायब इब्राहिम के शासन काल में हुआ था।


 राजभरों, तुगलक, शर्की, मुगलकाल व अंग्रेजों के शासनकाल के उत्थान-पतन का मूक गवाह यह शाही किला वर्तमान में भारतीय पुरातत्व विभाग की देखरेख में है।

 इस किले के अंदर की सुरंग का रहस्य वर्तमान समय में बंद होने के बावजूद बरकरार है। शाही किले के अंदर अच्छा सा पुष्पोद्यान विकसित कर आधुनिकतम रेस्टोरेण्ट तथा प्रेक्षागृह के निर्माण को अमली जामा पहना दिया जाए तो किले व शहर की खूबसूरती में चार चांद लग सकता है जो पर्यटकों के लिए एक विशेषक आकर्षण केन्द्र होगा

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