राम भर का इतिहास कुशीनगर गोरखपुर
हिंदुस्तान का वो शक्तिशाली वंश जिसने लंबे समय तक देश पर राज किया. 2वीं से लेकर 16वीं शताब्दी के युग को 'भर भारशिव युग' भी कहा गया है।
इतिहासकाल में इस वंश ने कई शक्तिशाली योद्धा और राजा हुए है,
इतिहास के पन्नों में राजभरो के मान-सम्मान और बहादुरी के क़िस्से सरकारी दस्तावेजों और इतिहासो में तमाम साहित्य किताबों में दर्ज हैं. अगर आप पूरा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, नेपाल जैसे राज्यों में जायें, तो भरो का छाप देखने को मिलेगी।लेकिन गद्दार धोखेबाज भरो का नामोनिशान मिटा देना चाहते थे। लेकिन ऐसा कदापि नहीं हुआ। आज भी बहुत सारे साक्ष्य मिलते हैं
मध्य भारत में जहां भी जाइये भारशिव(भर) क्षत्रियो का कोई ना कोई भग्नावशेष मिल ही जाएगा. कहीं दुर्ग हैं, कहीं टीले हैं, कहीं खंडहर है तो कहीं देवस्थान,और तालाब हैं. लगता यही है कि मुगल शासकों को छोड़कर सबसे अधिक भग्नावशेष किसी राजवंश के प्राप्त होते हैं तो वह केवल भर भारशिव वंश के हैं
इन मुर्दा टीलो, दुर्गों, खंडहरों और देव स्थानों की भग्न प्रतिमाओं में कितनी महत्वपूर्ण सामग्री जो ऐतिहासिक छिपी है अनुमान लगाना कठिन है.
गांव-गांव में भारशिव( भरो) के स्मृति चिन्ह इसके साक्षी है कि मध्य भारत में इनका कितना भव्य और सुदृढ़ सम्राज्य रहा होगा।
इन टीलों में एक विशेष प्रकार की लाखोरी ईटों, बर्तनों के टुकड़े और सिक्के, राख के ढेरों में दुर्लभ पुरातत्व छिपा है
सन 1976 ईस्वी में रायबरेली जिले के सलोन तहसील के अंतर्गत एक छोटे से गांव डीहवा में टीले की जब परगना अधिकारी श्री अमिय चतुर्वेदी की मौजूदगी में खुदाई हुई तो, उसमें ऐसे नक्काशी दार बर्तन टुकड़े नीव आदि मिले जो भरो के बताये गए हैं बनारस में इन लोगों ने 10 अश्वमेध यज्ञ किया था।
जो आज दशाश्वमेध घाट के नाम से प्रसिद्ध है। इनका राज्य एटा मथुरा कन्नौज फर्रुखाबाद उन्नाव प्रतापगढ़ रायबरेली सुल्तानपुर फैजाबाद जौनपुर और बनारस, गोरखपुर तक फैला हुआ था। कालांतर में इतिहास ने पलटा खाया गुप्त मौर्य और हर्ष कालीन भारत में यह भर इधर-उधर बिखर गए। इस युग में भी यह लोग छोटे-छोटे किंतु सुदृढ़ दुर्ग बनाकर शासन करते थे.
पूर्व मध्य काल में कुशीनगर और देवरिया पर भरों का शासन था। इनके एक प्रमुख राजा इंदु भर हुए। दूसरे राजा राम भर भी हुए।
राम भर ने स्तूप के निकट राम भर झील बनवाये थे। ह्वेनसांग के समय में यह झील नहीं थी। स्तूप जब टीला में तब्दील हो गया, तब भी राम भर की झील बची रही। फिर स्तूप टीले को भी राम भर टीला कहा जाने लगा।
1910 में राम भर टीले की खुदाई हीरानंद ने करवाये थे। हीरानंद शास्त्री अज्ञेय के पिता थे। लेकिन पूरे स्तूप का अनावरण हुआ।
मल्लों का दिया गया मकुटबंधन चैत्य नाम विस्मृत होते गया और इसे राम भर स्तूप के नाम से जाना जाने लगा।
राम भर ही बाद में रामाभार हो गया जैसे बृज भर का बृजाभार हो गया है। वहाँ के बोर्ड पर यही रामाभार स्तूप अंकित है।
सातवीं सदी में ह्वेनसांग ने कुशीनगर की यात्रा की। यात्रा के सिलसिले में वे मकुटबंधन चैत्य पहुँचे। मकुटबंधन चैत्य बुद्ध का अंतिम संस्कार स्थल है।
मकुटबंधन चैत्य पूर्व में भरो का मकुटबंधन संथागार हुआ करता था। यहीं भर राजाओं का मकुट बंधन होता था। भरो ने यहीं बुद्ध के अंतिम संस्कार किए और यह चैत्य बनवाए।
खुदाई से पहले मकुटबंधन चैत्य के ऊपर भवानी की मठिया स्थापित थी। पूरा क्षेत्र वनाच्छादित और दुर्गम था। स्थानीय लोग चैत्य की ईंटे उखाड़ कर ले जाया करते थे।
ह्वेनसांग नदी के पार 300 कदम चलकर इस स्तूप के पास पहुँचे थे। वह नदी हिरण्यवती थी। वह आज भी इस स्तूप से कोई 300 कदम पर बहती है। बुद्ध ने अपनी अंतिम सांस भरो के गढ़ में छोड़े थे...





