बनारस में दशाश्वमेध घाट पर सिलापट लगवाने की सिफारिश राजभर समाज ने की है
वाराणसी के भारशिव क्षत्रियों की एक अच्छी पहल,,,,,,,,,
जो कि, दशाश्वमेध_घाट_वाराणसी पर भारशिव क्षत्रिय सम्राट श्री_वीरसेन_राज_भर_जी महराज का शिलापट्ट लगवाने के लिए शासन से गुजारिश की गयी थी, जिसको प्रशासन के पास यानि कि जिलाधिकारी महोदय के पास भेजा गया, और उन्होंने ने वाराणसी नगर निगम विभाग को जाँच का आदेश दिया है.!!!
विदित हो कि अति प्राचीन दशाश्वमेध घाट वाराणसी का नगर निगम द्वारा सुंदरीकरण हो रहा है, जो स्वागत योग्य है परन्तु दशाश्वमेध घाट वाराणसी पर एक शिला पट्ट लगवाया जा रहा है जिसमे यह बताया जा रहा है की दशाश्वमेध घाट का निर्माण ब्रम्हा जी ने किया था, परन्तु पुरातात्विक तथ्यों के अनुसार अश्वमेध भारतवर्ष के एक प्रख्यात प्राचीनकालीन यज्ञ का नाम है सार्वभौम राजा अर्थात् एक चक्रवर्ती सम्राट मिर्जापुर एवं मथुरा के नरेश श्री वीरसेन राजभर जी महाराज को ही दस अश्वमेध यज्ञ करने वाला कहा जाता था परन्तु ऐतरेय ब्राह्मण 8 पंचिका के अनुसार इस को समपन्न करने के लिए अन्य महत्वशाली राजन्यों को भी अधिकार था। आश्वलायन श्रौत सूत्र 10 6 1 का कथन है कि जो सब पदार्थो को प्राप्त करना चाहता है, सब विजयों का इच्छुक होता है और समस्त समृद्धि पाने की कामना करता है वह इस यज्ञ का अधिकारी है। इसलिए सार्वीभौम के अतिरिक्त भी मूर्धाभिषिक्त राजा अश्वमेध कर सकता था । आपस्तम्ब श्रौतसूत्र 20 1 1 लाट्यायन 9 10 17 । स्थल निरक्षण में आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया द मॉनूमेन्टल एंटीक्विटिस एंड इंस्क्रिप्शन्स के सर्वे के मुताबिक पुरे अवध सहित बनारस क्षेत्र तक भारशिव क्षत्रियों भर राजभर शासको का राज था, और इनकी कालखंड भी पहली शताब्दी से ग्यारहवीं शताब्दी तक निर्विवाद मिलती है।भर_राजभर के किले कोट अवध सहित अयोध्या व आजमगढ़ भदोही तक मिलता है। रिपोर्ट की कॉपी संलग्न पेज नंबर 300 से 393 तक। प्राचीन सिक्के व अन्य अभिलेख निरक्षण में पुरातत्व विभाग व् विन्सेंट स्मिथ के द्वारा शोध में जो सिक्के पुरे अवध क्षेत्र में पाए गए है जो कैटेलॉग ऑफ़ इंडियन म्यूजियम पेज 206 पर दर्ज है उनसे यह विदित होता है
जो प्राचीन भारशिव क्षत्रिय महान् शासको का शासन क्षेत्र पुरे अवध सहित बनारस क्षेत्र पर था, जिसमे उनका काल खंड भी पहली शताब्दी से मिलता है।. जो कि सर्व विदित है कि भारशिव क्षत्रिय सम्राट श्री वीर सेन देव जी महाराज सर्व समर्थ और विश्व विजेता चक्रवर्ती सम्राट रहे और तीसर शताब्दी में भगवान शिव का भार अपने कंधों पर लिया और समस्त पृथ्वी को पापियों दुराचारी,बयाभिचारी, अनाचारी, धर्म विरोधी किसानों की सत्ता को उखाड़ कर फेंक दिया और उनका दमन करने के पश्चात काशी के पवित्र नगमा नामक स्थान के अस्सी घाट 10 अश्वमेध यज्ञ करा कर पूरे विश्व में अपनी संप्रभुता और राजसत्ता का लोहा मनवाया तथा भगवान शिव चंडी का पवित्र मंदिर श्री विश्वनाथ मंदिर का निर्माण काशी और मथुरा में भी भबय तथा विश्व प्रसिद्ध शिव चंडी मंदिर का निर्माण करवाया, जिसको विश्व प्रसिद्ध इतिहासकार साहित्यकार डॉक्टर से काशी प्रसाद जायसवाल जी ने भारत का अंधकार युगीन इतिहास नामक पुस्तक में जो कि भारत के मद्रास यूनिवर्सिटी में पढ़ाई जाती है, विस्तृत चर्चा करते हुए वाकाटक राजकीय दान संबंधित ताम्रपट पर लिखे गए इतिहास निम्नलिखित पंक्तिया जो इस प्रकार से है को इस प्रकार से है, अंश भार सन्निवेशित शिव गंगो द़ाहन शिव सुपरितुषट समुत्पादित राजवंशानाम् पराक्रम अधिगत: =भागीरथी= अमल जल: मुर्द्धा भिषिक्ततानाम्। दशाश्वमेध== अवभृथ स्नानाम् भारशिव नाम्। ''अर्थात उन भारशिवो (के वंश)जिनके के राजवंश का आरंभ इस प्रकार हुआ कि उन्होंने शिवलिंग को अपने कंधे पर वाहन करके शिव को भलीभांति परितुष्ट प्किया ---व्यवहार शिव जिनका राज्याभिषेक उस भागीरथी के पवित्र जल से हुआ था ।---वे भारशिव जिन्होंने 10 अश्वमेध यज्ञ करके अवभृथ स्नान किया था। ऐसा गौरवशाली और पराक्रम का इतिहास है भारशिव क्षत्रियों राजपूतोंऔर राजभरों का जो एक समुद्र में हिमालय पर्वत को डूबा या नहीं जा सकता उसी तरह भारतीय क्षत्रियों के इतिहास को मिटाया नहीं जा सकता--

