महारानी कितमा राजभर का इतिहास
महारानी किंतमा राजभर बारा देव राजभर की पत्नी थी , व राजकुमारी होने के साथ-साथ अपने पति का भी युद्ध क्षेत्र में भी साथ देना अपना कर्तव्य समझती थी,बारादेव राजभर के शहादत के बाद पूरा कार्यभार उनके कंधों पर आ पड़ा,
भारत का अतीत बड़ा गौरवमय रहा है। भारत की धरती को शस्यश्यामला कहा जाता है, रत्नगर्भा कहा जाता है, इतना ही नही अपितु वीरप्रसविनी कहा जाता है क्योंकि समय समय पर भारत मां की कोख से महान दार्शनिक ऋषि मुनि, राष्ट्रनायक उन्नायक, महान नेता युग प्रणेत, और वीर-वीरांगनाएं उत्पन्न होते रहे हैं जिनकी यश पताका आज देश विदेश में सर्वत्र फहरा रही है। ऐसी ही एक वीरांगना हैं भर राजकुमारी कितमा। यदि हम भारत की योद्धा स्त्रियों की चर्चा करें तो महारानी लक्ष्मीबाई का नाम सभी को तुरंत याद आ जाता है किंतु राजकुमारी किंतमा राजभर का नाम कम ही लोग जानते हैं। राजकुमारी किन्तमा राजभर की आँखों में शेरनी जैसी ज्वाला और चेहरे के आभामंडल में सूर्य जैसा तेज दमकता था। अदम्य साहस तथा शौर्य तो इसे जन्म से ही मिले थे और वीरता तथा निडरता तो मानो जैसे इसे घूंटी में पिलायी गयी हो। वह बचपन से ही अप्रतिम प्रतिभा की धनी थी।
भारत भूमि की एक ऐसी वीरांगना हैं राजकुमारी किन्तमा राजभर जिसके बारे में इतिहास में ना तो विस्तारपूर्वक लिखा गया और ना ही कभी सुना गया। यह आधुनिक इतिहासकारों द्वारा उपेक्षा की शिकार हुई एक ऐसी वीरांगना की वीरगाथा है जिसने विश्वविजय का सपना देखने वाले विरोधियों से लोहा ले कर अपने राज्य की रक्षा की। इस अद्धभुत शौर्य से पूर्ण वो वीरांगना थी, बाराबंकी गणराज्य की राजकुमारी किन्तमा राजभर। इतिहास में उनके स्वरूप का वर्णन इन शब्दों में मिलता है – राजकुमारी की शारीरिक ऊँचाई छ: फीट, रंग उगते हुए सूर्य की लालिमा की भांति, मुख पर सौम्यता और क्षात्र तेजयुक्त माँ दुर्गा जैसी तेजस्वी आँखें। उनका प्रिय कार्य था शास्त्र अध्ययन एवं शस्त्र अभ्यास। मात्र 16 वर्ष की आयु में ही वे धनुर्वेद के ज्ञान में पूर्ण रूप से पारंगत हो चुकी थीं। इसके अलावा उन्होंने कई सारे युद्धकला में विशेषज्ञता हासिल कर चुकी थीं। जैसे 1) यन्त्रमुक्त युद्धकला (अस्त्र शस्त्र के उपकरण जैसे धनुष और बाण के उपयोग से विभिन्न प्रकार के तरीके से शत्रु पर प्रहार करने की पद्धति), 2) पाणिमुक्त युद्धकला (हाथ से फेंके जाने वाले अस्त्र जैसे कि भाला फेंकने की पद्धति), 3) तांगथा युद्धकला (आँखों में पट्टी बांध कर दोनों हाथों में तलवार लिये युद्ध करने की पद्धति), 4) हस्त अस्त्र युद्ध विद्या जिसमें हवाओं की रफ्तार से तलवार चलाया जाता था और 5) नियुद्ध अर्थात बिना हथियार के युद्ध करना जिसे आज हम मार्शल आर्ट भी कहते हैं।
राजकुमारी किन्तमा राजभर के प्रजावत्सल होने का प्रमाण इसी से मिलता है कि राजकुमारी बाल्यकाल में ही प्रजा के दुख दर्द को देखना एवं उनका दुखों के निवारण की चेष्टा करना सीख गयीं थीं। इसके लिए वे साधारण वेष में प्रजाजनों के बीच जाकर उनके दुख दर्द एवं शिकायतें भाँपकर अतिशीघ्र उसका निवारण हेतु आवश्यक कदम उठाती थीं। उनके इस कार्य से बाल्यकाल से ही उनके अंदर एक प्रजावत्सल महारानी का स्वरूप दिखने लगा था
एक वीरांगना की इतनी अदभुत वीरगाथा पढऩे एवं सुनने के बाद अवश्य ये प्रश्न उठता है कि इस वीरगाथा से हम अनभिज्ञ क्यों हैं। उसका उत्तर ये है कि राजकुमारी किन्तमा राजभर के समूल इतिहास को नष्ठ कर दिया गया है। इनका इतिहास बहुत ढूंढने पर केवल दो संदर्भों में और वह भी केवल दो पन्नों में पाया जाता है।
