राजभरों का सबसे ज्यादा समय तक कलिंजर किले पर शासन था....
"बघेलों का गहोरा अंचल में आगमन"
शोधार्थी इतिहास,
ठाकुर रणमत सिंह महाविद्यालय,
रीवा (म.प्र.)
सुखेन्द्र सिंह
शोध सारांश :-विज्ञान, संचार और प्रौद्योगिकी में उन्नत अनुसंधान का अंतर्राष्ट्रीय जर्नल (IJARSCT)
गहोरा के बघेल मूलतः गुजरात के चालुक्य सोलंकी हैं। गुजरात के पाटन (अनहिलवाड पाटन) से प्रायः 10 मील दक्षिण-पश्चिम में व्याघ्रपल्ली गाँव स्थित है। गुजरात के चौलुक्य कुमारपाल (1143-73 ई.) ने अपनी मौसी के पुत्र अर्णोराज को इसी व्याघ्रपल्ली का सामन्त नियुक्त किया था। इसी अर्णोराज के पुत्र लवणप्रसाद को 'व्याघ्रपल्लीय कहा गया है। इस लवणप्रसाद व्याघ्रपल्लीय का पुत्र वीरधवल हुआ। इस वीरधवल का पुत्र वीसलदेव गुजरात का पहला बघेल शासक हुआ, जिसने 1245 से 1262 ई. तक शासन किया। उल्लेखनीय है कि बघेल शासक वीसलदेव के खम्भात में शिलालेख में बघेलों का वंशारम्भ प्रायः उसी रूप में दिया गया है, जिस रूप चालुक्य नरेशों का मिलता है। इस शोध पत्र में बघेलों के आने का मूलतः वर्णन शामिल किया गया है।
गहोरा के बघेल मूलतः गुजरात के चालुक्य सोलंकी हैं। गुजरात के पाटन (अनहिलवाड पाटन) से प्रायः 10 मील दक्षिण-पश्चिम में व्याघ्रपल्ली गाँव स्थित है। गुजरात के चौलुक्य कुमारपाल (1143-73 ई.) ने अपनी मौसी के पुत्र अर्णोराज को इसी व्याघ्रपल्ली का सामन्त नियुक्त किया था। इसी अर्णोराज के पुत्र लवणप्रसाद को व्याघ्रपल्लीय कहा गया है। इस लवणप्रसाद व्याघ्रपल्लीय का पुत्र वीरधवल हुआ। इस वीरधवल का पुत्र वीसलदेव गुजरात का पहला बघेल शासक हुआ, जिसने 1245 से 1262 ई. तक शासन किया। उल्लेखनीय है कि बघेल शासक वीसलदेव के खम्भात में शिलालेख में बघेलों का वंशारम्भ प्राय: उसी रूप में दिया गया है, जिस रूप चालुक्य नरेशों का मिलता है ।
गुजरात के स्वाधीन बघेल शासक बीसलदेव का उत्तराधिकारी संभवतः कर्णदेव बघेल हुआ, जिसे मुस्लिम इतिहासकारों ने कर्ण बघैला लिखा है।' कर्णदेव बघेल को आकस्मिक मुस्लिम आक्रमण का सामना करना पड़ा, जिसके लिए वह कदापि तैयार न था। यह मुस्लिम आक्रमणकारी था अलाउद्दीन खिलजी, सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी सत्ता का भूखा एक महत्वाकांक्षी शासक था। उसके गुजरात पर आक्रमण के जहाँ कुछ मूलभूत कारण थे, वही आकस्मिक कारण भी थे। अलाउद्दीन का मूल कारण साम्राज्य विस्तार करना था । अलाउद्दीन ने अपने शासन काल में सर्वप्रथम गुजरात जैसे दूरस्थ राज्य पर आक्रमण क्यों किया? सर्वथा उल्लेखनीय है, हमें राजपूत चारण नैणसीख्यात' से अलाउद्दीन के गुजरात आक्रमण के तात्कालिक कारण का आभास मिलता है। चारणों द्वारा लिखित नैणसीख्यात से ज्ञात होता है कि गुजरात के बघेल राज्य का मंत्री माधव अपने राजा कर्ण बघेल से अप्रसन्न था, क्योंकि राजा कर्ण बघेल ने राज्य मंत्री माधव की अनुपस्थिति में उसकी पत्नी रूपसुन्दरी का अपहरण किया था। इसलिए माधव ने सुल्तान अलाउद्दीन से सहायता मागी थीं। इसकी पुष्टि हमें रासमाला से भी होती है। रासमाला में गुजरात के माधव की अभागी पत्नी रूपसुन्दरी द्वारा राजा कर्ण बघेल को अभिशाप देने की कथा मिलती है। रूपसुन्दरी ने कर्ण के व्यवहार से क्षुब्ध होकर उसे श्राप दिया था। माधव ने कर्ण के व्यवहार से दुःखी होकर अलाउद्दीन से सहायता मांगी थी। वह ऐसे अवसर की तलाश में था, अतः सुल्तान अलाउद्दीन के लिए यह स्वर्णिम अवसर मिल गया था।
गुजरात राज्य की आन्तरिक कलह से प्रेरित होकर अलाउद्दीन ने बीच के राज्यों को छोड़कर गुजरात पर एकाएक आक्रमण करने का निश्चय किया।
अलाउद्दीन ने गुजरात आक्रमण का भार उलूग खाँ को सौंपा। उलूग खां ने गुजरात राज्य में प्रवेश कर व्यापक लूटपाट शुरू की। सारे राज्य में लूट का आतंक फैल गया।
इस आतंक से भगदड़ मच गई। राजा कर्ण बघेल इस आकस्मिक आक्रमण से घबरा गया। वह अपनी सुरक्षा में दक्षिण की ओर देवगिरि भागा ।
मुस्लिम सेनाओं को लूट से त्रस्त यहाँ के बघेल राजवंशी भ्राता विन्ध्यन श्रृंखला से होते हुए मध्यपूर्व विन्ध्य के तलहारी क्षेत्र में आ गये। इसका उल्लेख एकात्रा बान्धवगढ़ में इस प्रकार किया गया है चाकर में, बीसलदेव जेठे, भीमल लहुरे गहोरहि कालिंजरहि आइ दुइ भाई भर राजा के आए । पुरिखा सात भरि गहोरा रहे। ठाकुर कहावें लागि।' भीमलदेव गहोरा के लोधिन कह मारि के गहोरा छडाइ लीन्हेंन, पुनि गोरा कैरि राज कालिंजर के भीमलदेव का दीन्हेनि। इस संदर्भ में खासकलमी वंशावली में इस प्रकार उल्लेख किया गया है
कालिंजर आइ भर राजा वीसलदेव के चाकरमें गहोरा जागीर पाइन। तिवारी मिलाइ के आधाराज देह काही हींसा लोधिन का मारिन गहोरा अमल भा।
समय के साथ गहोरा राज्य के शासक बन गये, गहोरा रहें पुरिखा सात" जनश्रुति से ज्ञात होता है कि इन बघेलों का आदि पुरुष व्याघ्रदेव" था।
बघेलों का यह मूल पुरूष व्याघ्नदेव संभवतः कोई ऐतिहासिक व्यक्ति नहीं था।
इसी प्रकार वीरभानूदय काव्य" में व्याघ्रपाद मुनि को बघेलों का मूल पुरूष निरूपित किया गया है। वीरभानूदय काव्य में बघेलों को भारद्वाज " - व्याघ्रपाद गोत्रीय एव व्याघ्रपाद मुनि का वंशज बतलाया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि व्याघ्रपाद 12 एक गोत्र प्रवर्तक मुनि रूप में कल्पित हैं। कवि ने संभवतः अनुश्रुतियों के आधार पर वंश के अनेक पूर्वजो का नाम जोड़ दिया है, जो ऐतिहासिक नहीं प्रतीत होते । अधिकांश बघेल वंशावलियों में अंकित व्याघ्रदेव के अतिरिक्त कर्णदेव, सोहागदेव, सारंगदेव, वीसलदेव, दलकेश्वर, मलकेश्वर और वरियारदेव को इतिहासकार काल्पनिक समझते हैं। ये नाम वीरभानूदय काव्य में भी नहीं है। वीरभानूदय काव्य में बघेल राजकुल की शुरूआत भी ( भीमलदेव) से होती है।
सुल्तान बनते ही अलाउद्दीन ने परिस्थितियों को देखते हुए 24 फरवरी 1299 ई0 हो गुजरात के बघेलों पर आक्रमण किया।" अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण ने बघेलों को गुजरात छोड़ने के लिए बाध्य किया। राजा कर्ण दक्षिण में देवगिरि भाग गया। उसी समय बघेलों की एक राजशाखा, विन्ध्य व सतपुड़ा के दर्रे (मध्यमार्ग) से होती हुई इस विन्ध्यन तलहार में आ गई। इस समय विन्ध्यन तलहार पर भरों का स्वामित्व था । बाह्य होकर बघेलों ने कालंजर के भर शासकों की सेवा ग्रहण कर ली। इस प्रकार हम देखते हैं कि बघेलों ने जब इस विन्ध्य क्षेत्र में प्रवेश किया तब भर राजाओं की सेवा की। तदन्तर इसी तलहार में गहोरा को हस्तगत कर उसे अपनी राजधानी बनाया।
विन्ध्यन पठार में आने पर बघेलों ने सर्वप्रथम कालिंजर के भरों के यहां सेवा की । इस पठारी 16 तलहार में भरों के कमजोर पड़ने पर बघेलों ने गहोरा में अपना राज्य स्थापित किया था।
बुन्देलखण्ड के पश्चिमोत्तर भाग में दो भर शासकों ने कम से 1252 से 1285 ई० तक शासन किया था।" मिर्जापुर के विन्ध्यन पठार में भी भरों की काफी बस्ती मिलती है। इसी मिर्जापुर के भुइहार लोग अपने को भर राजाओं के वंशधर मानते हैं।
दक्षिणी इलाहाबाद में स्थिति भीरपुर में भी भरों की बस्ती मिलती है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस स्थान का भीरपुर नाम संभवतः भरों की वजह से पड़ा है। इस प्रकार भरों के संदर्भ विन्ध्यन पठार में यत्र-तत्र मिलते हैं। इम्पीरियल गजेटियर में स्पष्टतः लिखा है कि चन्देलों और कलचुरियों की सत्ता जब टूटी तक तेरहवीं शती ई० में यमुना के दक्षिणी भाग (विन्ध्यन पठार) में अनेक राजपूत जातियों ने स्वतंत्र सत्ता स्थापित की, जिनमें भर वंशीय क्षत्रिय भी थे। कुतुबुद्दीन ऐबक के द्वारा कालिंजर की लूट 1204 ई0 के बाद कालंजर में जो अव्यवस्था फैली उसके परिणाम स्वरूप भरो ने कालिंजर पर अधिकार कर लिया। फलतः भर इस क्षेत्र के शासक बन गए। इन भरों की एक राजधानी भरशिवगढ़ या भरगढ़ (बरगढ़) में भी बनी जो कालिंजर से पूर्व में इसी विन्ध्यन तलहार में स्थित था।भर महाराजा सुर्की संभवतः विन्ध्यन तलहार में स्थानीय शासक थे, प्रारंभ में राजा सुर्की राजभर इधर-उधर बिखरे हुए थे । भरों के शक्तिशाली हो जाने पर सुर्की भर राजा (जयचन्द्र) के सेवक बन गये, सुर्कियों की सेवा को देखकर भर राजा ने उन्हें तरौहा के इलाका जागीर के रूप में दे दिया। यहीं से सुर्कियों का राजनैतिक विकास हुआ और वे तरौहा के शासक बन गये। सर्वप्रथम भर महाराजा सुर्कि ने 1047 ई० (1104 वि०स० ) में तरोंहा में एक दुर्ग का निर्माण करवाया। उनकी स्थिति तरौहा क्षेत्र में मजबूत हो गयी। स्थिति सुदृढ़ हो जाने के बाद परासिन में एक गढ़ी का निर्माण 1194 ई0 (1251 वि०स०) में करवाया। तरौंहा से भर राजा सुर्कि ने लम्बा शासन किया।
तराहा से शासन करने वाले राजा सुर्कि भर कुल में 29 राजा हुए, जो इस प्रकार हैं-
(1) सुखदेव (2) रामदेव, (3) रूपदेव, (4) इन्द्रदेव, (5) शिवदेव, (6) कर्णदेव, (7) अर्जुनदेव, (8) हरिदेव (9) अभयदेव (10) शुक्रदेव, (11) खगबदरदेव (12) धुर्मदेव ( 13 ) दीप्तदेव ( 14 ) रत्नदेव, (15) गुरूदेव (16) संग्रामदेव, ( 17 ) मेदनीदेव (18) घासेना, (19) पूर्णदेव (20) देवचन्द्रदेव ( 21 ) पर्मदेव (22) भीमसेनदेव (23) विजयदेव (24) टोडरमल देव (25) रैय्याराव (26) सांगररावदेव (27) बसन्तराइ (28) पहार सिंह ( 29 ) रामसिंह देव।
सुर्कियों ने चित्रकूट में राज्य स्थापित किया। य्याराव चित्रकूट का प्रसिद्ध सुर्की भर राजा हुआ, जो रीवा के बघेल राजा अनिरूद्ध सिंह का समकालीन थे। रैय्या राव के पुत्र सारगदेव व हमदय राव हुए। सागरराव का पुत्र बसन्तराव भर राजा सुर्कि प्रसिद्ध राजा हुए। पटेहरा में भर राजा शुर्की शासक की एक शाखा मिलती है, यहाँ के सुर्कियों में इस प्रकार शासक हुए थे फतेहबहादुर सिंह, हरदत्त सिंह, शत्रुशात सिंह, ब्राम्हणप्रताप सिंह भगवन्त सिंह, रमेश्वर प्रताप सिंह, तरूणेन्द्रशेखर सिंह इस सुर्की वंश के लोग पटेहेरा. सीतापुर, रैगांव, भागलपुर, पड़री व मनिगमा में अब भी मिलते हैं। बांदा में सुर्की सरवार, डेलौरा, कोलवासिंहपुर, पथरेश्वर, रामुपर व राजौसा में मिलते हैं। विन्ध्यन तलहार में लौरीगढ़ नामक गढी शुर्कियों की मिली है।
भर राजा सुर्कि के समान ही लोधी भी विन्ध्यन तलहार के स्थानीय शासक थे। जिस समय बघेल विन्ध्यन तलहार में प्रविष्ट हुए लोधी गहोरा में शासन कर रहे थे। वर्तमान में गहोरा उत्तर प्रदेश के बांदा चित्रकूट - जिले में कर्बी से प्राय: 20 किलोमीटर पूर्व रैपुरा गाँव के पास स्थित है। इसके दक्षिण में गहोरा खास स्थित है. जो अब नदियों के बांध में आ गया है। हम देख चुके हैं कि बघेल जब गुजरात से विन्ध्य के तलहारी क्षेत्र में आये, तब कालिंजर के भर राजा की सेवा में आ गये थे। धीरे-धीरे बघेलों ने अपनी शक्ति बढ़ाई, वे ठाकुर कहलाने लगे। शक्ति बढ़ने के साथ ही बघेलों ने अपना स्वतंत्र राज्य बनाने का निश्चय किया। उनकी दृष्टि गहोरा जैसे राज्य पर पड़ी, जहाँ लोधी शासनरत थे। ठाकुर भीम बघेल ने लोधी शासक के मंत्री तिवारी ब्राम्हणों को आधा राज्य देने का लालच देकर अपने कक्ष में कर लिया। इस प्रकार लोधी शासक के तिवारी मंत्री ने विश्वासघात् किया। मंत्री के इस विश्वासघात की आड़ में बघेलों ने गहोरा के लोधी शासक को मार डाला और गहोरा का राज्य अपने अधिकार में कर लिया। लोधियों से गहोरा लेने वाला भीम का पुत्र रणिड् देव था, जिसे वीरभानूदय काव्य में गहोरा का पहला बघेल अधिकारी कहा गया है। मुस्लिम लेखों में बघेल राज्य का नाम भाटदृगहोरा मिलता है। इस भाट गहोरा का केन्द्र कालिंजर था। इस प्रकार लोधी संभवतः कालिंजर के भर शासकों के आधिपत्य (अधीन) में थे। साक्ष्यों के अभाव में गहोरा के लोधियों का पूरा इतिहास दे सकना संभव नहीं।
संक्रमणकालीन विन्ध्य की राजनैतिक स्थिति बड़ी ही डांवा डोल रही है। तुर्कों ने इस क्षेत्र के राजपूतों की शक्ति लगभग तोड़ दी थी। उनकी सत्ता भग्न होकर छिन्नदृभिन्न हो गई। विन्ध्यन तलहार के अभेद्य दुर्ग कालिंजर जिसे महमूद गजनवी भी चन्देलों से नहीं ले पाया था । 1205 ई0 मुहम्मद गौरी कुतुबुद्दीन ऐवक ने कालिंजर को घेरा था। तदन्तर उसे 1234 ई० में सुल्तान इल्तुतमिश के एक जनरल मलिक
नुसरतउद्दीन तायसी ने अपने प्रभाव में लाने का प्रयास किया था।" इल्तुतमिश के बाद तुर्क दिल्ली की सत्ता में उलझ गये। ऐसी स्थिति में
क्षत्रिय जातियों ने विन्ध्य क्षेत्र में अपनी सत्ता जमाने का प्रयास किया, जिनमें भर लोधी व खैरवार आदि प्रमुख थे। जीतन सिंह लिखते हैं किष्मुसलमान बादशाहों द्वारा जब प्रचुर प्रभावशाली जाति के राजा महराजाओं का शासनाधिकार छीन लिया गया, तब से इस प्रदेश में अनेक क्षुद्र वंश के राजागण ग्रामदृग्राम में अपने डेढ़ चावल की खिचड़ी अलग-अलग पकाना प्रारम्भ कर दिये. इनमें भर सेंगर और चौहान इतने तो राजपूत थे, इनके अलावा गोंड़ और कुछ दूसरी छोटी-छोटी जातियों के राजा भी देश में शासन करने लगे थे। इन सभी में भरों क्षत्रिय का आधिपत्य बहुत अधिक प्रख्यात था। मालूम होता है कि स्वयं कालिंजर पर भी इनका अधिकार हो गया था, और मुसलमान बादशाहों तक के विरूद्ध इन भर क्षत्रियो ने शस्त्र उठाने का साहस किया था। बघेलों ने जब सर्वप्रथम विन्ध्यन तलहार में प्रवेश किया था, तब कालिंजर के भरो के यहाँ नौकरी की थी, "कालिजर हिं आइ दुइ भाई भर राजा के पुरिखा सात भरि गहोरा रहें। ठाकुर कहावें लागि । भीमलदेव गहोरा के लोधिन कहं मारिके गहोरा छंड़ाइ लीन्हेनि", बघेलों ने गहोरा लोधी या लोधा जाति से और बान्धवगढ़ कमर जाति को अधीन बनाकर प्राप्त किया था । अतः इस काल के सत्ता संघर्ष में बघेल अन्ततः सफल रहे, जिन्होंने गहोरा में अपनी सत्ता को स्थिर किया। इस प्रकार विन्ध्य क्षेत्र में बघेलों ने सर्वप्रथम गहोरा से अपना शासन शुरू किया।
[1] अशोक कुमार मजूमदार चौलुक्याज आफ गुजरात, भारतीय विद्या अध्ययन 1956। 169 [2] जिन विजयमुनि सम्पादित 'प्रबन्धचिन्तामणी (मेरुतुंग कृत)। कुमारपालप्रबन्ध श्अथ कदाचि दानक नामा मातृष्वस्ती यस्तत्से वागुणतुष्टेन राज्ञा दत्त सामन्त पदोपि। प्र. 94 तथा श्श्रीमदीम देव राज्य चिन्ताकारी व्याघ्रपल्लीय चिह्न प्रसिडः श्री मदानाकनन्दनः श्री लवणप्रसाद पृ0 181 [3]। चौलुक्यों की मूल शाखा की समाप्ति के बाद यह बघेल शाखा 1245 से 1304 ई0 तक गुजरात में
स्वतंत्र रूप से शासन करती रही. मजूमदार, वही अo 10 [4]. भावनगर इन्सक्रिप्सनस, क्र. 216, मजूमदार वही, पृ० 169
[5] मुस्लिम इतिहासकार इसामी, बर्नी तवारीख-ए-फिरोजशाही,
[6] नैणसीख्यात, भाग-1, पृ0 213 [7]. रासमाला ( फोर्वस0189 पृ. 278
[8]। एकत्रा बान्धवगढ़ (जमाबंदी- 1)
[9] रवासकलमी वंशावली (सरस्वती भंडार, रीवा किला)
[10] रीवा राज्य गजेटियर 1907 ई0 जीतन सिंह, रीवा राज्य दर्पण, रघुवर प्रसाद, रीवा राज्य का इतिहास, भानू सिंह, वीर व्यंकटरमण व्याघ्र वंशावली (उर्दू) यादवेन्द्र सिंह, रींवा राज्य का इतिहास. रामप्यारे अग्निहोत्री, रींवा राज्य का इतिहास, बांधव पत्रिका, वि०स० 2002
[11] माधव वीरभानूदय काव्य, जो संभवतः 156 ई0 के आसपास के और बघेलों का गोत्र भारद्वाज था तथा उनके वर्तमान वंशधरों लिखा गया था।
[12] भारद्वाज गोत्र गुजरात चालुक्य का भी यही गोत्र है रीवा के बघेल नरेश भी भारद्वाज गोत्र के हैं। रणजीत सिंह सत्याश्रय 1938 पृ0 48 दृ 49, 77, 96, माधव, वीरभानूदय काव्य 1938 सर्ग व श्लोक 19 भारद्वाजारिष्टनेमि वंशों संगदतो नृपौ श्लोक 28- भारद्वाजो मुनीन्द्र ......व्याघ्रपाद....... [13] माधव वीरभानूदय काव्य सर्ग 1 श्लोक 6-8
[14] का० प्र० जायसवाल युगीन भारत, पृ० 105 चित्र | [15]. गुजरात ते आए पुरिखा बान्धवगढ़ (जमाबन्दी- 1) सरस्वती भण्डार किला रीवा ।
एकत्रा बान्धवगढ़- भरन्वये वीसलदेव एधित कालिजरिह आई दुई भाई भर राजा के चाकर में.....
एकत्रा कालिजरे।'
आईजेएआरएससीटी
आईएसएसएन (ऑनलाइन) 2581-9429
विज्ञान, संचार और प्रौद्योगिकी में उन्नत अनुसंधान का अंतर्राष्ट्रीय जर्नल (IJARSCT)
[17] हबीबुल्ला The Foundation of Maslim rule in India 1945 पृ0 142
[18] वसु हिन्दी विश्वकोष, कलकत्ता भाग 15. पृ0 727, 728. भुइहाखोह मिर्जापुर में स्थित है।
[19] इम्पीरियल गजेटियर भाग 6, पृ० 149 व 349 • रामप्यारे अग्निहोत्री वही री०रा०इ० पृ० 344-45
[20]।
[21] भूषण "वसन्त राय सुर्की की काहूंन बाग मुरकी ।" [22] लोधी संभवत: भरों के आधिपत्य के शासन करते थे।
[23]. एकत्रा बाधोगढ़, जमाबन्दी-3 तिवारी मिलाई के आधा राजदेई का हीसा सरस्वती भण्डार, रीवा एकत्रा बाधोगढ़, लोधिन का मारिन, गहोरा अमलभा
[24] माधव, वीरभानूदय काव्य लध्वा गहोरा 1/10
[25] मिन्हाजुद्दीन सिराज, तबकात-ए-नासिरी भाट गहोरा, जिसका केन्द्र कालिंजर था।
[26] मिनहाज सिराज, तबकात- ए- नासिरी, पृ0 824 [27] इण्डि एन्टी जिल्ड 4. पृ0 265 वि0रि0सो0 जिल्ड 14, पृ0 297 जिल्ड, 46, पृ0 227
[28] जीतन सिंह, रीवा राज्य दर्पण, पृ० 38, राधेशरण, संक्रमण कालीन विन्ध्य में सत्ता संघर्ष ( शोधलेख ) [29] रामलखन सिंह, प्रतिहार राजपूतों का इतिहास पृ० 95 कमर (कवर) भी संभवतः क्षुद्र जातिय थे
[30] हीरा नन्द शास्त्री, क्रिटिकल एनालसिस ऑफ वीरभानूदय काव्य बड़ौदा 1938, पृ0 23-24
